विकास या विनाश? जंगलों का सौदा, भविष्य की कीमत पर
उत्तराखंड में राष्ट्रीय राजमार्गों के विस्तार, बाईपास निर्माण और हवाई अड्डों के विकास जैसी रैखिक अवसंरचना परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की जा रही है और उसके लिए लगातार प्रस्ताव लाए जा रहे हैं।
● जुलाई 2026 – देहरादून क्षेत्रीय राजमार्ग विस्तार परियोजनाएँ: लगभग 19,000 पेड़ काटे गए; 51,000 से अधिक चिन्हित।
● प्रारम्भिक 2025 – भानियावाला–ऋषिकेश राजमार्ग विस्तार: लगभग 4,369 पेड़ चिन्हित; विरोध के बाद रोक लगने से पहले 400 से अधिक काट दिए गए।
● दिसंबर 2025 – बागेश्वर–कांडा राष्ट्रीय राजमार्ग: ओक, देवदार, अखरोट और काफल सहित 30 प्रजातियों के लगभग 5,745 पेड़ चिन्हित।
● दिसंबर 2025 – हर्षिल–गंगोत्री मार्ग चौड़ीकरण: लगभग 6,000 से 7,000 पेड़ चिन्हित या काटे गए।
कहा जाता है— “ये पेड़ बहुत अधिक जगह घेरते हैं। इन्हें हटाने से सड़कें चौड़ी होंगी, यातायात कम होगा और लोगों का समय बचेगा। जंगली जानवर यात्रियों के लिए खतरा हैं और अक्सर सड़कें जाम कर देते हैं।”
फिर आश्वासन दिया जाता है—
“हम जगह खाली करेंगे, चौड़े राजमार्ग बनाएँगे और बेहतर संपर्क स्थापित करेंगे। इससे पर्यटन बढ़ेगा और आर्थिक विकास होगा। और चिंता मत कीजिए—हर एक पेड़ के बदले हम चार पौधे लगाएंगे। नए जंगल उगाकर पर्यावरण का संतुलन बना देंगे।”
शिवालिक हाथी रिज़र्व के घने साल वनों से लेकर ऋषिकेश और उत्तरकाशी की सड़कों के किनारे खड़े सदियों पुराने देवदारों तक—उत्तराखंड में यही वादा बार-बार दोहराया जाता है। लेकिन प्रकृति के प्रति सामान्य संवेदनशीलता रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस दलील की वास्तविकता समझ सकता है।
तब प्रश्न उठता है—पहली ही मूसलाधार मानसूनी बारिश, जिसे इन पौधों को झेलना होगा, उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? तपती गर्मियों की दोपहर जब सूरज इन्हें पीला और सूखा बना देगा, और एक छोटी-सी चिंगारी इन्हें राख में बदल सकती है, तब कौन इनके साथ खड़ा होगा? इनके स्वाभाविक रूप से परिपक्व वृक्ष बनने तक इनके जीवित रहने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न—कोई यह उम्मीद कैसे कर सकता है कि एक नन्हा-सा पौधा तुरंत उस सबकी भरपाई कर देगा, जो एक पूर्ण विकसित वृक्ष आज हमें देता है? उसकी विशाल छाया, कार्बन को अवशोषित करने की अद्भुत क्षमता, असंख्य जीवों का सुरक्षित आश्रय और हिमालय की नाज़ुक मिट्टी को थामे रखने वाली गहरी जड़ें—इन सबके बराबर पहुँचने में इन पौधों को दशकों लग जाएंगे।
क्या यह वैसा ही नहीं है जैसे किसी बुज़ुर्ग को केवल उसकी आर्थिक उत्पादकता के आधार पर आँकना और उस आधार, अनुभव तथा जीवन-मूल्यों की पूरी तरह अनदेखी कर देना, जिन पर एक परिवार मजबूती से खड़ा रहता है?
पौधा, पेड़ नहीं होता; वह केवल एक पेड़ बनने की संभावना होता है। सदियों पुराने वृक्षों की कटाई को उचित ठहराने के लिए चार पौधे लगाने की बात दरअसल आज उपलब्ध जीवंत और वास्तविक पारिस्थितिक सुरक्षा को तथाकथित आर्थिक विकास के नाम पर एक जनसंपर्क अभियान से बदल देने जैसा है।
यह एक ऐसा समझौता है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती—और इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
-रेणुका लूथरा

