धर्म-संस्कृति

धर्म-कलि संधिकाल में मनुष्य जीवन

धर्म-कलि संधिकाल में मनुष्य जीवन-सुधीर गोयल

शारदीय नवरात्र के श्रीगणेश पर भक्ति भाव में निमग्न सनातन अनुयायियों के लिए दुर्गा पूजा, महानवमी, दशहरा पर्यंत श्रीराम के वनवासोपरांत अवध आगमन नरक चातुर्दशी भैयादूजादि अनेकों धार्मिक उत्सवों और भगवान श्रीराम की लीला के मंचन के दौर में मह्ऋषि वाल्मिक की श्री रामायण एवं परम संत महाकवि तुलसीदास की श्रीरामचरितमानस के माध्यम से जनमानस को प्रेषित संदेश पर चर्चा किया जाना सर्वथा उपयुक्त होगा।

कहा जा रहा है कि कलियुग अंत की ओर है। भगवान नारायण के दशम् अवतार भगवान कल्कि का पदार्पण हो चुका है। ऐसे में कलि (बुराईयों के प्रतीक) का अंत निश्चित है।विद्वत मतानुसार वर्ष 2032 तक हमारी पृथ्वी सहित ब्रह्मांड में अनेकानेक परिवर्तन होने हैं जिसमें युद्ध, जलपलावन, अग्नि, भूकंप का प्रकोप प्राय: प्रत्यक्ष प्रकट है अर्थात यह चेतावनी है कि सुधर जाओ या विनाश का सामना करो।
ऐसे कठिन दौर में धार्मिक निष्ठा, सत्य, प्रेम व करुणा को धारण करने वाले जनमानस को एक ही संबल दृष्टिगोचर होता है वह है भगवान का भरोसा। वहीं सच्चिदानंद भगवान श्री नारायण अपने दशम अवतार में प्रकट होकर भक्तजनों को कलिकाल के दुराचारों से उबारेंगे।
भगवत आश्रय अवलम्बित धार्मिक निष्ठा, सत्य, प्रेम व करुणा को धारण करने वाले जनमानस के लिए श्रीरामावतार लीला का अमृतवचन श्रवण, स्मरण एवं अवधारण अनिवार्य हो जाता है। ऐसे में यह विचार महत्वपूर्ण हो जाता है कि रामायण का मुख्य आधार (सूत्र) ‘धर्म’ (Righteousness) और ‘कर्तव्य’ क्या है?
यद्यपि श्री राम श्रीरामायण व श्री रामचरितमानस नामक महाकाव्य के केंद्र (नायक और कर्ता) हैं, लेकिन पूरी रामायण का ताना-बाना मानवीय मूल्यों, वचनों के पालन और आदर्शों के इर्द-गिर्द बुना गया है।
रामायण के मुख्य आधार स्तंभों को हम इन बिंदुओं के माध्यम से समझ सकते हैं:
मर्यादा और धर्म: रामायण का सबसे प्रमुख सूत्र ‘मर्यादा’ है। इसी कारण श्री राम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहा जाता है। यह ग्रंथ सिखाता है कि विषम परिस्थितियों में भी अपने धर्म (कर्तव्य) का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।
रघुकुल की रीत (वचन पालन): “रघुकुल रीत सदा चली आई, प्रान जाहु बरु बचनु न जाई।” राजा दशरथ का कैकेयी को दिए वचन को निभाना और राम का सहर्ष वनवास स्वीकार करना, पूरी कहानी का टर्निंग पॉइंट (मोड़) है।
रिश्तों के आदर्श: रामायण केवल एक राजा की कहानी नहीं है, बल्कि यह आदर्श पारिवारिक संबंधों का सूत्र है—जैसे आदर्श पुत्र (राम), आदर्श भाई (लक्ष्मण-भरत), और आदर्श पत्नी (सीता)।
अहंकार पर सत्य की विजय: रामायण का एक और मुख्य आधार यह संदेश देना है कि चाहे बुराई (रावण) कितनी भी शक्तिशाली और ज्ञानी क्यों न हो, अंत में जीत सत्य, सदाचार और धर्म की ही होती है।
उधर माता सीता की स्थिति रामायण में केवल एक ‘पात्र’ की नहीं है, बल्कि वे इस पूरे महाकाव्य की मूल ऊर्जा, प्रेरणा और केंद्र बिंदु (Nucleus) हैं। माता सीता के बिना न तो रामावतार का उद्देश्य पूरा होता, न लंका का दहन होता और न ही संसार को श्री राम के मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप का बोध होता।
माता सीता ने संसार के समक्ष न केवल पवित्रता, एक आदर्श पत्नी, वधु, माता व भगनी होने का संदेश जन मानस को दिया है अपितु कर्मठता, सजीविता, सदाचार, समर्पण व धर्म निष्ठा का पाठ पढ़ाकर संसार का कल्याण किया है।
तदैव प्रत्येक प्राणी के लिए जीवन में सत्य, धर्म, निष्ठा, सदाचार, सदगृहस्थ सहित मर्यादा व वचन का पालन करना महत्वपूर्ण हो जाता है। कलिकाल में जहां अधर्म अपने चरम पर है मनुष्य को और अधिक सावधान होने की आवश्यक है अपने सम्पूर्ण चरित के सम्बंध में।
हम जब अपने जीवन के सुख-दुख को देखते हैं तो केवल इस जन्म का ही अवलोकन कर पाते हैं इस जन्म में क्या घटा कैसा घटा यही सोच पाते हैं। यह विचार नहीं करते कि हमें जो भी सुख या दुख मिले हैं वे वस्तुत: हमारे पूर्व जन्मों के सुफल अथवा कष्ट हैं जिन्हें इस जीवन में हमें भोगना ही है साथ ही मनुष्य जीवन, जिसे सभी योनियों में श्रेष्ठ बताया गया है तथा जिसको पाने के लिए देवता भी लालायित रहते हैं में भौतिक अभिलाषाओं के मध्य अपने जीवन को अध्यात्मिक सुचिता प्रदान करते हुए अपने मूल अर्थात परमात्मा में विलय का हर सम्भव प्रयास करना चाहिए। जीवन से मुक्ति या मोक्ष ही मनुष्य का लक्ष्य होता है जिसके विपरीत आचरण करने पर जन्म जन्मातर तक भटकाव, तृष्णा व कष्ट के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं लगता।
आइए इस धार्मिक और मार्मिक अवसर पर प्रभु राम की वंदना करते हुए उनसे संयमित व समर्पित जीवन प्रदान करने का कामना करें। जय श्रीराम